Saturday, July 4, 2009




शुभा की दो कवितायें


पेड़ों की उदासी


पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी


जिसके ज़रिये वे अपनी बात


इन्सानों तक पहुंचा सकें


शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात का


वे बीज कम उगाने लगे


और बीजों में उगने की इच्छा ख़त्म हो गई


बचे हुए पेड़ों की उदासी देखी जा सकती है


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हमारे समय में


हम महसूस करते रहते हैं


एक दूसरे की असहायता
हमारे समय में यही है


जनतंत्र का स्वरूप


कई तरह की स्वाधीनता है


हमारे पास


एक सूनी जगह है


जहाँ हम अपनी असहमति


व्यक्त कर सकते हैं


या जंगल की ओर निकल सकते हैं


आत्महत्या करते हुए हम


एक नोट भी छोड़ सकते हैं


या एक नरबलि पर चलते


उत्सव में नाक तक डूब सकते हैं


हम उन शब्दों में


एक दूसरे को तसल्ली दे सकते हैं


जिन शब्दों को


हमारा यकीन छोड़ गया है


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शुभा बेहद कम छपने वाली कवियत्री हैं। उनकी जो कविताएँ गाहे-बगाहे विभिन्न पत्रिकाओं में छपी हैं, उनमें स्त्री विमर्श बेहद ओथेन्टिक और मुखर रूप से सामने आया है। यहाँ दी जा रही कविताओं का स्वर थोड़ा भिन्न है। १९९२ और उसके बाद के हादसों से उपजी व्यथा की अनुगूंज भी इस स्वर में शामिल है



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