असद ज़ैदी की एक कविता ..... Tuesday, July 14, 2009
असद ज़ैदी की एक कविता ..... Monday, July 13, 2009
(मुक्तिबोध की कवितायें - - - - - - - - - - - - - -
पता नहीं कब, कौन, कहाँ किस ओर मिले,
किस सांझ मिले, किस सुबह मिले!!
यह राह जिंदगी की
जिससे जिस जगह मिले
...टटोलो मन, जिससे जिस छोर मिले,
कर अपने-अपने तप्त अनुभवों की तुलना
घुलना मिलना!!
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स्वर्गीय उषा
तुमको निहारती बैठेगी
आत्मीय और इतनी प्रसन्न
मानव के प्रति, मानव के जी की पुकार
जितनी अनन्य!
('पता नहीं')
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आदमी की दर्दभरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह ख़ूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी मां के झुर्रीदार
चेहरे पर छाए हुए
आंखों में डूबे हुए
जिंदगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी!
('चांद का मुंह टेढ़ा है')
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कोशिश करो
कोशिश करो
जीने की,
ज़मीन में गड़कर भी!
('एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथ्य')
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बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने...
सब सच्चे लगते हैं
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
प्रत्येक वाणी में महाकाव्य-पीड़ा है,
पलभर मैं सबमें से गुज़रना चाहता हूँ,
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
इस तरह ख़ुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ.
('मुझे क़दम-क़दम पर')
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यदि उस श्रमशील नारी की आत्मा
सब अभावों को सहकर
कष्टों को लात मार, निराशाएँ ठुकराकर
किसी ध्रुव-लक्ष्य पर
खिंचती-सी चली जाती है,
जीवित रह सकता हूँ मैं भी तो वैसे ही!
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थूहर के झुरमुटों से लसी हुई मेरी इस राह पर
धुंधलके में खोए इस
रास्ते पर आते-जाते दीखते हैं
लठ-धारी बूढ़े-से पटेल बाबा
ऊँचे-से किसान दादा
वे दाढ़ी-धारी देहाती मुसलमान चाचा और
बोझा उठाए हुए
माएँ, बहनें, बेटियाँ...
सबको ही सलाम करने की इच्छा होती है,
सबको राम-राम करने को चाहता है जी
आंसुओं से तर होकर प्यार के...
(सबका प्यारा पुत्र बन)
सभी ही का गीला-गीला मीठा-मीठा आशीर्वाद
पाने के लिए होती अकुलाहट
किंतु अनपेक्षित आंसुओं की नवधारा से
कंठ में दर्द होने लगता है
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असह्य-सा स्वयं-बोध विश्व-चेतना-सा कुछ
नवशक्ति देता है
('मुझे याद आते हैं')
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गिरस्तिन मौन मां-बहनें
सड़क पर देखती हैं
भाव-मंथर, काल-पीडित ठठरियों की श्याम गो-यात्रा
उदासी से रंगे गंभीर मुरझाए हुए प्यारे
गऊ-चेहरे
निरखकर,
पिघल उठता मन!!
रुलाई गुप्त कमरे में हृदय के उभड़ती-सी है!!
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भोले भाव की करुणा बहुत ही क्रांतिकारी सिद्ध होती है.
('मेरे लोग')
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अरे! जन-संग ऊष्मा के
बिना, व्यक्तित्व के स्तर जुड़ नहीं सकते.
प्रयासी प्रेरणा के स्रोत
सक्रिय वेदना की ज्योति,
सब साहाय्य उनसे लो.
तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी.
कि तदगत लक्ष्य में से ही
हृदय के नेत्र जागेंगे,
वह जीवन-लक्ष्य उनके प्राप्त
करने की क्रिया में से
उभर-ऊपर
विकसते जाएँगे निज के
तुम्हारे गुण
कि अपनी मुक्ति के रास्ते
अकेले में नहीं मिलते!
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मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में
सभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमाएँ
गिराकर तोड़ देता हूँ हथौड़े से
कि वे सब प्रश्न कृत्रिम और
उत्तर और भी छलमय,
समस्या एक-
मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में
सभी मानव-
सुखी, सुंदर व शोषण-मुक्त
कब होंगे?
('चकमक की चिनगारियाँ')
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उन जन-जन का दुर्दांत रुधिर
मेरे भीतर, मेरे भीतर.
उनकी हिम्मत, उनका धीरज,
उनकी ताक़त
पायी मैंने अपने भीतर.
कल्याणमयी करुणाओं के
वे सौ-सौ जीवन-चित्र लिखे
मंडराता है मेरा जी चारों ओर सदा
उनके ही तो.
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मस्तिष्क तंतुओं में प्रदीप्त वेदना यथार्थों की जागी
वह सड़क बीच
हर राहगीर की छांह तले
उसका सब कुछ जीने पी लेने की उतावली
यह सोच कि जाने कौन वेष में कहां वह कितना सत्य मिले-
वह नत होकर उन्नत होने की बेचैनी!
('जब प्रश्नचिह्न बौखला उठे')
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अजाने रास्तों पर रोज़
मेरी छांह यूं ही भटकती रहती
किसी श्यामल उदासी के कपोलों पर अटकती है
अंधेरे में, उजाले में,
कुहा के नील कुहरे और पाले में
व खड्डो-खाइयों में घाटियों पर या पहाड़ों के
कगारों पर
किसी को बांह में भर, चूमकर, लिपटा
हृदय में विश्व-चेतस अग्नि देती है
कि जिससे जाग उठती है
समूची आत्म-संविद् उष्मश्वस् गहराइयां,
गहराइयों से आग उठती है!!
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मैं देखता क्या हूं कि-
पृथ्वी के प्रसारों पर
जहां भी स्नेह या संगर,
वहां पर एक मेरी छटपटाहट है,
वहां है ज़ोर गहरा एक मेरा भी,
सतत् मेरी उपस्थिति, नित्य-सन्निधि है.
('अंत:करण का आयतन')
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सचमुच, मुझको तो जिंदगी-सरहद
सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती!!
मैं परिणत हूँ,
कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को
जन को.
Monday, July 6, 2009
नरेश प्रेरणा की एक पुरानी कविता
मेरे शब्द
मेरे शब्दों में
सिर्फ़ नफरत नहीं है
सिर्फ़ प्यार भी
नहीं है
शारीरिक गुणवत्ता भी नहीं है
उनके शब्दों में
ऊँचे ऊँचे और
एक के बाद एक लगातार
दिखाई देने वाले
सपने हैं
हमें लगता है
हर रात एक नए युग
की शुरुआत होती है
हर तरफ सब कुछ नया
नई नीतियां
नई प्रणालियाँ
नए समझोते
बड़े प्यार से हर बड़ी समस्या से
बच के निकालने के ।
मेरे शब्दों में
नफरत है
समस्याओं के प्रति
क्रोध है
समस्याओं के दिन बा दिन बढ़ने पर
इंक़लाब का नारा बुलंद करते है
इन समस्याओं को दूर करने के लिए।
फैक्ट्रियों में काम करता
सड़कों पर कागज चुगता
और स्कूल जाते बच्चों को निहारता
हर बच्चा मेरे शब्दों की
ज़रूरत महसूस करता है
लगातार बढती उत्सुक्ताएं
समाज को समझने की
मेरे शब्दों में विद्यमान हैं।
लोगों को
समाज की वयवस्था
समझाने का मौका चाहने वाले
लाखों बेरोजगारों के
इरादे शब्दों में हैं
नौकरी लगे लोगों में
छटनी की समस्या
लगातार बढ़ रहा कम करने का समय
कभी भी नौकरी से निकलने की
सर पर लटकती तलवार
सभी समस्याओं को सुलझाने के लिए
संगठित न होने देने के सरकारी नीतियों
के खिलाफ ज़ोर डर रोष
मेरे शब्दों में।
उनके शब्दों का प्रचार प्रसार
किया जाता है
धर्म राजनीती
और पुरे मीडिया द्वारा
उनके शब्दों के पीछे
बड़ी ताक़त है
लोगों को लगता है वो कभी भी
ख़त्म न होंगे
हमेशा यूँ ही ठहाके मरते रहेंगे
लोगों को
कभी कभी एइसा भी लगता होगा
मेरे शब्द शअनिक है
और मेरे शब्दों के पीछे
बहुत कम ताक़त है?
मेरे शब्दों को अपनाने की ज़रूरत
हर अलग अलग जगह
बेहतर जीवन के लिए संगर्ष
में लगे लोग महसूस कर रहें हैं।
और मेरे शब्द
इस पुरी जनशक्ति को
संगठित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं
जिसमें आधुनिकता के खोखले
नीतियों और समझोतों को
जो हमारे मूल अधिकारों को
हमसे अलग रखने के लिए
बनाये गए हैं, को
तोड़ गिरना है।
अलग अलग जगहों से उठ कर
मेरे शब्द नए जीवन का निर्माण
करने में लगे हैं
वे जीवित रहेंगे
जब तक जीवन है
जन समूह है
और बेहतर जीवन के लिए इच्छा है
मेरे शब्द
और जन समूह
मिटा देंगे उन
शब्दों को
जो जन समूह को उनके
मूल अधिकारों ले अलग रखकर
जन समूह को तोड़कर
कमज़ोर कर
अपनी सत्ता बनाये रखते है
..................................................................... जतन से साभार, अंक १२
...............नरेश, सफ़दर की शहादत के ठीक बाद से हरयाणा में नाटक आन्दोलन को बनाने और आगे बढ़ने के लिए नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं। वे हरयाणा ज्ञान विज्ञानं समिति के राज्य सचिव मंडल के सदस्य और राज्य के संस्कृतीत विंग के कन्वीनर हैं ।
.....उन्होंने ये कविता san ८६-८७ में लिखी थी.
Sunday, July 5, 2009

Saturday, July 4, 2009
शुभा की दो कवितायें
पेड़ों की उदासी
पेड़ों के पास ऐसी कोई भाषा नहीं थी
जिसके ज़रिये वे अपनी बात
इन्सानों तक पहुंचा सकें
शायद पेड़ बुरा मान गए किसी बात का
वे बीज कम उगाने लगे
और बीजों में उगने की इच्छा ख़त्म हो गई
बचे हुए पेड़ों की उदासी देखी जा सकती है
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हमारे समय में
हम महसूस करते रहते हैं
एक दूसरे की असहायता
हमारे समय में यही है
जनतंत्र का स्वरूप
कई तरह की स्वाधीनता है
हमारे पास
एक सूनी जगह है
जहाँ हम अपनी असहमति
व्यक्त कर सकते हैं
या जंगल की ओर निकल सकते हैं
आत्महत्या करते हुए हम
एक नोट भी छोड़ सकते हैं
या एक नरबलि पर चलते
उत्सव में नाक तक डूब सकते हैं
हम उन शब्दों में
एक दूसरे को तसल्ली दे सकते हैं
जिन शब्दों को
हमारा यकीन छोड़ गया है
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शुभा बेहद कम छपने वाली कवियत्री हैं। उनकी जो कविताएँ गाहे-बगाहे विभिन्न पत्रिकाओं में छपी हैं, उनमें स्त्री विमर्श बेहद ओथेन्टिक और मुखर रूप से सामने आया है। यहाँ दी जा रही कविताओं का स्वर थोड़ा भिन्न है। १९९२ और उसके बाद के हादसों से उपजी व्यथा की अनुगूंज भी इस स्वर में शामिल है
Sunday, June 7, 2009
हम देखेंगे
हम देखेंगे
लाज़िम है केः हम भी देखेंगे
वोः दिन केः जिसका वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिक्खा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गराँ
रूई की तरह उड़ जायेंगे
हम महकूमों के पाँवों-तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अह्ल-ए-हिकम के सर ऊपर जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के का'बे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अह्ल-ए-सफ़ा,मर्दूद-ए-हरम
मसनद पेः बिठाये जायेंगे
सब ताज उछाले जायेंगेसब तख़्त गिराये जायेंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है,नाज़िर भी
उट्ठेगा 'अनक हक़' का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क-ए ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
तराना
दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जायेंगे
कुछ अपनी सज़ा को पहुँचएंगे,कुछ अपनी जज़ा ले जायेंगेऎ
ख़ाक-नसीनों उठ बैठो,वो वक़्त क़रीबा पहुँचा है
जब तख़्त गिराये जायेंगे,जब ताज उछाले जायेंगे
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें,अब ज़िन्दानो की खैर नहीं
जो दरिया झूम के उट्ठे हैं,तिनकों से न टाले जायेंगे
चलते भी चलो,बढ़ते भी चलो,बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो के : अब डेरे मंजिल ही पे डाले जायेंगेऎ
जुल्म के मातो,लब खोलो,चुप रहनेवालो,चुप कब तक
कुछ हश्र तो इनसे उट्ठेगा,कुछ दूर तो नाले जायेंगे

