Tuesday, December 15, 2009

शुभा की एक कविता


स्त्री का एकांत


गुरुओं क्या हाल बाना रखा है


आओ हम निभाती हैं स्त्री धर्म


पोंछती हैं तुम्हारा पसीना


देती हैं कन्तासमित उपदेश


कुछ समय अपना ज्ञान भूलकर देखो


कुछ समय शासन की इच्छा छोडो


कुछ समय पोषित करना सीखो


कुछ समय इस बच्ची को गोद में लो


जो तुम्हारी नहीं है

Thursday, November 26, 2009

मुक्तिबोध के जन्मदिन पर एक कविता



मनुष्य की परिभाषा
------------------------
यहाँ सामान बदला जाता है
और एक ख़ास रिआयत के साथ
पकने दी जाती है कविता
वैज्ञानिक अवसाद में
चेतना से छुड़ा देते हैं हम धब्बे
दुनिया से ख़राबी
जूतों से उनकी उदासी और नमी
और उन्हें दूसरे अन्तरिक्ष के अनाम
नक्षत्रों पर उतार आते हैं
आते हैं हमारे युग के आदिकवि राख और
धूल से सने
और कहते हैं सुनो लोग समझते हैं मैं
मर गया बोलो मैं क्या सचमुच मर गया
धैर्य से हम उन्हें समझाते हैं बाऊ तुम
मरे नहीं हो तुम तो अमर हो
हिन्दी साहित्य में कौन भला तुम्हें
मार सकता है
वह फफक-फफक कर रोने लगते हैं
सुनो-सुनो मुझे तुम्हारी बातें साफ़ सुनाई
नहीं देतीं हैं सिर्फ़
पानी की आवाज़ तुम्हारे और मेरे बीच
मुझे दिखाई देती है बस बारिश
बारिश बारिश
बाऊ चलो हम तुम्हें उस यान में
बिठा देते हैं जो क्षरण से भय से
गुरुत्वाकर्षण से मुक्त है
बाऊ नहीं सुनते-अच्छा तुम कहते हो
तुम लोग मेरे ऋणी हो : लाओ
वापस करो मेरा क़र्ज़ मैं इसी बारिश में
भीगता अकेला अपनी वास्तविकता के
तलघर में वापस चला जाऊँगा
असद ज़ैदी की यह कविता उनके पहले कविता संग्रह `कविता का जीवन` से ली गई है। कवि ने यह `मुक्तिबोध के लिए` है, जैसी कोई टिप्पणी अलग से नहीं की है और इसकी कोई आवश्यकता भी नहीं लगती है। मुक्तिबोध के जन्मदिन पर इस कविता को विशेष रूप से यहाँ दिया जा रहा है।

Thursday, October 29, 2009

एक परिंदा उड़ता है
-------------


एक परिंदा उड़ता है
मुझसे पूछे बिना
मुझे बताये बिना
उड़ता है एक परिंदा
मेरे भीतर
मेरी आँखों में

मनमोहन

Tuesday, August 11, 2009


मंगलेश डबराल की तीन कवितायें




घर शांत है


धूप दीवारों को धीरे-धीरे गर्म कर रही है

आसपास एक धीमी आँच है

बिस्तर पर एक गेंद पड़ी है

किताबें चुपचाप है

हालांकि उनमें कई तरह की विपदाएँ बंद है

में अधजगा हूँ और अधसोया हूँ

धसोया हूँ और अधजगा हूँ

बाहर से आती आवाज़ों में

किसी के रोने की आवाज़ नहीं है

किसी के धमकाने या डरने की आवाज़ नहीं है

न कोई प्रार्थना कर रहा है

न कोई भीख माँग रहा है

और मेरे भीतर ज़रा भी मैल नहीं है

बल्कि एक ख़ाली जगह है

जहाँ कोई रह सकता है

और मैं लाचार नहीं हूँ इस समय

बल्कि भरा हुआ हूँ एक ज़रूरी वेदना से

और मुझे याद आ रहा है बचपन का घर

जिसके आँगन में औंधा पड़ा में

पीठ पर धूप सेंकता था

मैं दुनिया से कुछ नहीं माँग रहा था

मैं जी सकता हूँ गिलहरी गेंद

या घास जैसा कोई जीवन

मुझे चिंता नहीं

कब कोई झटका हिलाकर ढहा देगा

इस शांत घर को





कुछ देर के लिए


कुछ देर के लिए मैं कवि था

फटी-पुरानी कविताओं की मरम्मत करता हुआ

सोचता हुआ कविता की जरूरत किसे है

कुछ देर पिता था

अपने बच्चों के लिए

ज्यादा सरल शब्दों की खोज करता हुआ

कभी अपने पिता की नक़ल था

कभी सिर्फ़ अपने पुरखों की परछाईं

कुछ देर नौकर था सतर्क सहमा हुआ

बची रहे रोज़ी- रोटी कहता हुआ


कुछ देर मैं अन्याय का विरोध किया


फिर उसे सहने की ताकत जुटाता रहा


मैंने सोचा मैं इन शब्दों को नहीं लिखूंगा


जिनमें मेरी आत्मा नहीं है जो आततायियों के हैं


और जिनसे खून जैसा टपकता है


कुछ देर मैं एक छोटे से गड्ढे में गिरा


रहा यही मेरा मानवीय पतन था


मैंने देखा मैं बचा हुआ हूँ और साँस


ले रहा हूँ और मैं क्रूरता नहीं करता


बल्कि जो निर्भय होकर क्रूरता किये जाते हैं


उनके विरुद्ध मेरी घृणा बची हुई है यह काफ़ी है


बचे-खुचे समय के बारे में मेरा खयाल था


मनुष्य को छह या सात घंटे सोना चाहिये


सुबह मैं जागा तो यह


एक जानी-पहचानी भयानक दुनिया में


फिर से जन्म लेना था यह सोचा मैंने कुछ देर तक





अभिनय
एक गहन आत्मविश्वास से भरकर

सुबह निकल पड़ता हूँ घर से

ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ

एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ

वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी

एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ

वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत

एक दोस्त के सामने खामोश बैठ जाता हूं

वह रहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो

जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा

वे कहते हैं अरे आप टीवी पर दिखे थे एक दिन

बाज़ारों में घूमता हूँ निश्शब्द

डिब्बों में बंद हो रहा है पूरा देश

पूरा जीवन बिक्री के लिए

एक नयी रंगीन किताब है जो मेरी कविता के

विरोध में आयी है

जिसमें छपे सुंदर चेहरों को कोई कष्ट नहीं

जगह-जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदले

जनाब एक पूरी फिल्म है लंबी

आप खरीद लें और भरपूर आनंद उठायें

Friday, July 24, 2009


फैज़ की एक नज़्म






इन्तिसाब



आज के नाम


और

आज के ग़म के नाम

आज का ग़म के: है ज़िन्दगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा

ज़र्द पत्तों का बन

ज़र्द पत्तों का बन जो मेरा देस है

दर्द की अंजुमन जो मेरा देस है

किलर्कों की अफ़सुर्दा जानों के नाम

किर्मख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम

पोस्टमैनों के नाम

ताँगेवालों के नाम

रेलवानों के नाम

कारख़ानों के भोले जियालों के नाम

बादशाहे-जहाँ, वालिए-मासिवा, नायबुल्लाहे-फ़िल-अर्ज़,

दहक़ाँ के नाम

जिसके ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए

जिसकी बेटी को डाकू उठा ले गए

हाथ-भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है

दूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली है

जिसकी पग ज़ोरवालों के पाँवों तले

धज्जियाँ हो गई है

उन दुखी माओं के नाम

रात में जिनके बच्चे बिलखते हैं और

नींद की मार खाए हुए बाजुओं से सँभलते नहीं

दुख बताते नहीं

मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं


उन हसीनाओं के नाम

जिनकी आँखों के गुल

चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बेकार खिल-खिल-खिल के

मुर्झा गये हैं।


उन ब्याहताओं के नाम

जिनके बदन

बेमुहब्बत रियाकार सेजों पे सज-सज के उकता गये हैं

बेवाओं के नाम

कटड़ियों और गालियों, मुहल्लों के नाम

जिनकी नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों

को आ-आ के करता है अक्सर वज़ू

जिनके सायों में करती हैं आहो-बुका

आँचलों की हिना चूड़ियों की खनक

काकुलों की महक

आरजूमंद सीनों की अपने पसीने में जलने की बू


तालिबइल्मों के नाम

वो जो असहाबे-तब्लो-अलम

के दरों पर किताब और क़लम

का तक़ाज़ा लिये, हाथ फैलाए

पहुंचे, मगर लौटकर घर न आये

वो मासूम जो भोलेपन में

वहाँ अपने नन्हें चिराग़ों में लौ की लगन

ले के पहुँचे, जहाँ

बँट रहे थे घटाटोप, बेअंत रातों के साये


उन असीरों के नाम

जिनके सीनों में फ़र्दा के शबताब

गौहर जेलख़ानों की शोरीद: रातों की सरसर में

जल-जल के अंजुम नुमाँ हो गये हैं

आनेवाले दिनों के सफ़ीरों के नाम

वो जो ख़ुशबू-ए-गुल की तरह

अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा हो गये हैं।

Thursday, July 16, 2009

मनमोहन की कुछ कविताएँ .........


देखते रहो



देखते रहो

अभी तो कुछ नहीं दिखाया गया


देखना, अभी क्या क्या दिखाया जाता है


तुम्हें कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है

तुम तो बस देखते रहो

----

----



ग़लती ने राहत की साँस ली



उन्होंने झटपट कहा

हम अपनी ग़लती मानते हैं



ग़लती मनवाने वाले खुश हुए

की आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी


उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
की अभी उसे पहचाना नहीं गया
----
----

एक इच्छा गीत

जीती रहें संध्याएँ
जो खामोश उतरें
गरीब बालक के मन पर

जीते रहें सफीने
वो जो हर दिशा में आयें आसमानों में
बिन बुलाये रोज़-बा-रोज़ मालामाल
और सूने तटों पर लग जायें

जीता रहे
पुरानी गलियों के झुरमुट में भटकते
अकस्मात जो किसी छोर पर दिख जाए
कठिन समय का मित्र

खादेदी गई रुंधी हुई
कुचली हुई बस्तियों में
जगे रहें दैनिक उत्पात

भयानक और गूढ़तम अंतर्कलह जगे रहें
बार-बार तडपे जहाँ नए ख्यालों की बिजली

खोले आँख जहाँ साफ सुथरे अच्छे जीवन की
पवित्र इच्छा नवजात
पहली बार

और जो छा जाए घटा की तरह
मन की मलिनता पर
गहन मंतव्य बार-बार मुंह दिखलायें
बड़ा रचने की इच्छा पैदा हो
और दूर तक देखने की योग्यता
----
----

यकीन

एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया

हिसाब
एक दिन सामने आएगा

जो बीच में ही चले गए
और अपनी कह नहीं सके
आयेंगे और
अपनी पूरी कहेंगे

जो लुप्त हो गया अधुरा नक्शा
फ़िर खोजा जाएगा
----
---
---

इच्छा

एक ऐसी सवच्छ सुबह मैं जागु
जब सब कुछ याद रह जाए

और बहुत कुछ भूल जाए
जो फालतू है
---
---
---

उसकी थकान

उस स्त्री की थकान थी
की वह हंस कर रह जाती थी

जबकि वे समझते थे
की अंततः उसने उन्हें क्षमा कर दिया है
---
---
---

शर्मनाक समय

कैसा शर्मनाक समय जीवित मित्र मिलता है
तो उससे ज्यादा उसके स्मृति
उपस्थित रहती है


और उस समृति के प्रति
बची खुची कृतज्ञता

या कभी कोई मिलता है
अपने साथ ख़ुद से लम्बी
अपनी आगामी छाया लिए
---
---
---

मनमोहन १९६९ से कवितायें लिख रहें हैं। मनमोहन बेशक उन कवियों में हैं जो 'साहिबे-दीवान' बनने से पहले ही अपनी पीढी की प्रतिनिधि आवाज़ बन जाते हैं।
मनमोहन की कविता में वैचारिक और नैतिक आख्यान का एक अटूट सिलसिला है। उनके यहाँ वर्तमान जीवन या दैनिक अनुभव के किसी पहलू , किसी मामूली पीड़ा या नज़ारे के पीछे हमेशा हमारे समय की बड़ी कहानियों और बड़ी चिंताओं की झलक मिलती रही है। मनमोहन अपनी पीढी के सबसे ज्यादा चिंतामग्न, विचारशील और नैतिक रूप से अत्यन्त शिक्षित और सावधान कवि हैं। मनमोहन की कविया में एक 'गोपनीय आंसू' और एक 'कठिन निष्कर्ष' है। इन दो चीजो को समझना आज अपने समय में कविता और समाज के, राजनीती और विचार के और, अंततः रचना और आलोचना के रिश्ते को समझना है।
------------------------------- असद ज़ैदी

मनमोहन की और कवितायें अगली पोस्ट में ------

Tuesday, July 14, 2009

असद ज़ैदी की एक कविता .....
.
.
.
एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी

होती जा रही है अब और ख़राब

कोई इन्सानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती

मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा

वह संगीन से संगीनतर होती जाती

एक स्थायी दुर्घटना है

सारी रचनाओं को उसकी बगल से

लम्बा चक्कर काटकर गुज़रना पड़ता है

मैं क्या करूँ उस शिथिल

सीसे-सी भारी काया को

जिसके आगे प्रकाशित कविताएँ महज तितलियाँ है और

सारी समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है

और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ।